गढवळी बोलि
गढवळी बोलि मा सब्ब से कठिन काम च, ईं बोलि का शब्दो को उच्चारण करण, किलैकि गढ़बळी बोलि मा लम्बु सुर ‘आ’, ‘ई’ ‘ऊ’ ‘औ’ त हिन्दी की ही तरौं छिन। मगर जब्ब जोर देके या और लम्बु सुर कैरिके बुलै जान्दु त शब्द को मतलब बदळि जान्दु। जन कि ‘चार’ को मतलब च संख्या या चरागाह मगर जब्ब चार का ‘आ’ बोन्न पर जोर दिये जान्दु त येको मतलब च ‘की तरह’ ( मतलब की तरौं अर्थ वींका ऐन सैन अपणी ब्वेकि चार च)। अर इन और भि शब्द छिन, जन की आरु (आरी) आरु (आडू) बाळो (बालक) बाळो (रेत) अर इन्नि भौत सा शब्द छिन। अपणी एक व्यवस्था होन्दी, अर व्याकरण ईं व्यवस्था तैं सही तरौं से ईसथीर करदी, या हम इन भि बोलि सकद्यां, कि व्याकरण भाषा को सरील एक शास्त्र च।
मनखि अपणा समाज मा रौन्दु अर तब्ब वेतैं अपणी बात एक-दूसरा का दगड़ा मा करणु खुणि एक आवाज की जरुरत होन्दी अर जब्ब उ ईं तैं लिखदु च त वे चिन्न तैं वरण बोलदन। ठिक उन्नि गढ़वळी मा हिन्दी की ही तरौं भौत सा शब्द छिन, मगर कुछ शब्द और भि छिन जु गढ़वळी बोलि मा बुलै जनदिन। जन कि ह्स्व स्वरों कों अलावा अतिह्स्व उच्चारण भि येमा मिलदु। अर येका अलावा ईं बोलि मा कम बुलै जाण वळु स्वर तैं जौर देके बोलण भि गढ़वळी बोलि मा हि दिखणु कू मिलदु। अर इन इलै च किलैकि लो दूर-दूर रै के भि एक-दूसरा बटि बात करदिन।
गढ़वली बोलि का मुख्या व्यंजन
क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, ड़, ढ़, ण्ह:, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म, य, र, र्ह, ल, ळ, ल्ह, व, श, ष, स, ह,
‘ळ’ अर ‘ण’ को उच्चारण गढ़वळी मा हिन्दी से अलग च। गढ़वळी मा शब्द का बीच मा अर अखरी मा आण वळु ‘न’ ‘ण’ ह्वे जान्दु। जन कि विनास- विणास,
स्वर/व्यंजन
कठिन-कठीण, पानी-पाणी, रानी- राणी।
गढ़वळी बोलि मा स, श अर ष मा भि बड़ी दिक्कत च किलैकि श अर ष व्यंजन का भौत कम शब्द छिन।